Monday, 26 October 2015

गर्मी की छुट्टियां


सवेरे से दोपहर तक, पता नहीं किस किस के छत पे कूदा फांदी मची होती थीI
गर्मी की छुट्टियां नानीघर में बिताते थे हम। जब तक चेहरा न झुलस जाए उसके पहले मजाल है जो हम सब भाई बहन अपनी धमाचौकड़ी से बाज़ आये ? गर्मी क्या होती है ये तो बस ‘नागराज’ के कॉमिक्स में जब नागराज को उसके दुश्मन आग के दरिए में फेंक देते थे, तब ही मालूम चलता था।
बीचली मंज़िल की रसोई से बड़ी भीनी सी खुशबू छत तक आती थी। जैसे ही वो खुशबू हमारे नाक तक पहुँचती थी, हम सारा खेल छोड़कर एक दूसरे को इशारा करते हुए नीचे रसोई तक की दौड़ लगा बैठते थे।
” क्या बन रहा है माँ ? क्या बना रही हो मौसी? नानी, क्या है खाने में ?”, और फिर सवालों की झड़ !
“मछली है! अभी तल रहा है, किसको किसको भूना हुआ खाना है ?”, बस इतना बोलना होता था की हम सब अपने नन्हे हाथों में स्टील के छोटे छोटे प्लेट लेके चूल्हे के सामने बैठ जाते थे।
“दो से ज़्यादा नहीं मिलेगा ! और लोगे तो झोर के साथ कुछ नहीं मिलेगा !” हम सबको पता होता था कि उस प्रसंग का वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं था !
जम कर भात और मछली खायी। जी हाँ ! तब ‘चावल′ नहीं भात खाते थे हम। और फिर वो ‘व्यापारी’ का खेल। तीसरे दिन तक अगर कोई खेल खिंच जाए लेकिन हम उसे खेलने से बाज़ न आएं तो सोचिये कितनी लगन और श्रद्धा रहा करती होगी उस खेल के प्रति ! बच्चे तो बच्चे, मामा और मौसी भी उन झूठे पैसों को गिनने की होड़ में पीछे नहीं रहते थे। तब वक़्त होता था लोगों के पास।
इतने में खबर आई कि बड़े मामा कोई नया वीसीआर कैसेट लेके आये हैं – किसी नए सिनेमा का कैसेट है ! बस फिर क्या। दौड़ कर सब ऊपर वाले मंज़िल के बाहर वाले रूम में पहुँच गए। उस रूम में चारो तरफ शेल्फ पे पुराने और नए सिनेमा के ऑडियो कैसेट और वीसीआर वाले विडियो कैसेट रखे रहते थे। एक मौसी माइकल जैक्सन की शौक़ीन थी – सो कुछ विडियो कैसेट माइकल जैक्सन के गानों और डांस विडियो के भी रखे होते थे।
‘बेस्टाविज़न’ की कलर टीवी रखी होती थी तब उस रूम में। और उसी के नीचे वीसीआर का डब्बा ! सब दौड़ कर अपना अपना फेवरिट स्पॉट पकड़ लेते थे। सबसे ज़्यादा लड़ाई टीवी के बगल वाले स्पॉट के लिए होती थी क्यूंकि वहाँ से सारे बटन दबा सकते थे और रिमोट वाले की एक नहीं चलती थी !
तब सिनेमा कहते थे ‘मूवी’ नहीं। सिनेमा शुरू हुई। 10 मिनट हुए नहीं की कुछ और घर के बड़े पहुँच गए रूम में। अब इनके लिए फिर से शुरू करो कैसेट। फिर से देखे हुए सीन देखो। ऐसा करते करते लगभग 1 घंटा निकल जाता था और तब ही आखिर कर सिनेमा शुरू होती थी।
बच्चों का काम होता था उस रूम में जो कूलर है उसमें पानी भरना। बड़े नाना के रूम से पेडस्टल वाला टेबल फैन उठा के लेते आते थे जो टीवी के पास होता था, और बाथरूम के नल से पाइप जोड़ कर कूलर को पानी से लबालब भर देते थे। मजाल है जो इतने लोगों के होने का बावजूद ज़रा भी गर्मी लगे। लाइट कटने पे 5-6 हाथपंखों का भी जुगाड़ था।
सिनेमा आधी ख़त्म हुई नहीं कि लाइट चली गयी। तब लाइट जाने पर अफ़सोस करना कोई व्यथा नहीं बल्कि रूटीन का एक हिस्सा था। लाइट कब वापिस आएगी इसका ज्ञान तो खैर शहर के बिजली विभाग वालों को भी नहीं होता था।
सो अब क्या किया जाए ? एक मौसी उठ कर रसोई के तरफ चली गयी। शाम होने को आ गयी थी। “ऐ गुड्डू, जाओ तो पिंटू के यहां के यहां से 25 समोसा और आधा किलो जलेबी लेके आ जाओ। सब बच्चा लोग को भूख लग गया है “, नानी ने मामा से कहा। ये बच्चों के नाम पर बड़ों की चांदी हो जाती थी।
“ऐ , लस्सी किसको किसको पीना है ? जल्दी बताओ”, मौसी पूछती। और उनके कहने से पहले ही हम दौड़ के फ्रिज के तरफ भागते और आइस-क्यूब का पूरा ट्रे उठा के रसोई पहुँच जाते। कोई ज्यादा सयाना होता तो रूहाफ्ज़ा की बोतल भी उठा कर ले आता।
शाम ऐसे बीतती। एक हाथ में समोसे और जलेबी और दूसरे हाथ में लस्सी या रूहाफ्ज़ा की ग्लास।
पूरा जमघट ख़त्म होते ही सब बच्चों को आर्डर दिया जाता – इस आर्डर का हमें पूरे दिन इंतज़ार रहता था। “बच्चा लोग, जाओ छत पे पानी मार दो, और बिछावन तकिया लेके ऊपर जाओ” ये सुनने भर की देर थी कि सभी दौड़ पड़े छत की ओर। शाम ढलने को आ चुकी थी – सूरज अपनी लालिमा लिए डूबने को तैयार और दूर शाम की अज़ान। सब छत की टंकी से बेतहाशा पानी की बौछार कर रहे होते थे पूरे छत पर। कोई पाइप से तो कोई बाल्टी से। आधे घंटे में पूरा छत ठंडा हो जाता था।
और फिर बिछावन और तकिया डाल कर सभी भाई बहन,मामा,मौसी,नानी और घर के सब बड़े छत पे आराम करने पहुँच जाते थे। और फिर बातों की झड़ी ! हमारी अपनी टोली होती थी। अन्ताक्षरी वाली। और वो जो अन्ताक्षरी चलती थी वो तब तक नहीं रूकती थी जब तक वापिस लाइट ना आ जाए।
“न से , न से ?” “न न न न ना रे ना रे ना रे” “चुप रहो। ये पहले गा चुके हैं हम लोग। ” और वो झगडे ! ऐसे में किसी ने नीचे झाँका। “ओये , लाइट आ गया है !”
बस फिर क्या ! सारा मजमा बिखेर के सब दौड़ पड़े टीवी रूम की ओर। वो सिनेमा जो पूरी करनी थी।
आज भी वो सिनेमा ख़तम नहीं हो रही। तब का वक़्त दिल के किसी कोने में उसी अधूरे सिनेमा सा अटका हुआ है। कभी इस तेज़ ज़िन्दगी से फुर्सत मिलती है तो वापिस उन पलों को समेट लेता हूँ। बंद एसी कमरों की गर्मियां तब की गर्मियों से आरामदायक तो हो सकती है, पर शायद उतनी खुशहाल नहीं। वो गाना याद आ रहा है उस सिनेमा से, “प्यार में दिल दे दिया मैंने तुझको दिल जानी … दीवानी मैं ……”

Saturday, 24 October 2015

संघर्ष



घर से निकलने ही वाला था।
मतलब हाथ मुह धो लिए, नाश्ता वाश्ता कर लिए, तैयार वैयार हो लिए, शर्ट वर्ट पैंट वैंट डीओ वीओ सब डाल लिए, बस जूते पहनने की देर थी। निकलने का समय हो गया था। अगर इससे 2 मिनट भी और देर हो जाए तो ऑफिस समय पर न पहुँच पाएं - ऐसी पूरी कैलकुलेशन कर रखी है हमने!
और तभी नीचे गद्दे पे पड़ा हुआ एक 'अकेला' मोज़ा हमें देख कर दांत निपोरने लगा। हृदय में यकायक ही ऐसा आतंक फैलाने वाला डर बैठ गया जिसकी तुलना शब्दों में नहीं की जा सकती।
"दूसरा मोज़ा कहाँ है !!?", मेरे अंतरमन में ये सवाल कौंधा! और साथ ही वो न चाहते हुए भी जानने वाला उत्तर : "पता नहीं कहाँ है ..."
मैंने प्रकाश के वेग से पूरे कमरे की छानबीन शुरू कर दी … एक एक सेकंड में एक घंटा बीतता हुआ नज़र आ रहा था .... समय निकलता जा रहा था … दुसरे मोज़े का कोई पता नहीं ! वो अकेला मोज़ा मेरी तरफ देख कर अट्ठास किये जा रहा था मानो कह रहा हो : "हाहाहा! अब देखता हूँ तू समय पे कैसे पहुँचता है !"
मैं भी उसे ये कह कर टाल देता हूँ, "समय पर तो पहुंचूंगा ही ! अगर तेरा जुड़वा नहीं मिला, तो बाकी पड़े मोज़े पहन कर जाऊंगा ..." वहाँ दरख़्त पे पड़े बाकी मोज़े मुस्कुरा उठे ....
लेकिन हरामी मन ! मानने को तैयार ही नहीं! इधर घड़ी की सूई हमारे अनुमानित समय सीमा को पीछे करने की होड़ में, और इधर हमारा मन जो हारने को राज़ी नहीं। इसी बीच हमारे मन में एक और अविश्वसनीय घटना का डर घर कर के बैठ गया। हमारी गंजी ऐसे ही एक दिन हमारे आँखों के सामने से ओझल हुई थी। और भगवान अल्लाह जीसस कसम खा कर कहते हैं, उस दिन पूरी कायनात छान मारी थी हमने उस गंजी की तलाश में ! आखिर कर थक हार के हमने सारी आस छोड़ दी थी। और हमारे डर, अचम्भे और अविश्वास की आप थाह नहीं ले सकते जब लगभग दो महीने बाद वही गंजी हमें हमारे बिस्तर के पास पड़े गद्दे पे बैठी मिली थी !
इसी कश्मकश, दौड़ और मनः कलोल में हमारी वो कॅल्क्युलेटेड समय सीमा समाप्त हो गयी ! गुस्से और अशांति से तो जैसे हमारा हृदय फूटने को आ गया। अभी भी वो मोज़ा हमारी तरफ नज़र किये रावण वाली हसी हँस रहा था ! बाकी मोज़े भी मायूस हो चुके थे। चूंकि अब वक़्त तो निकल चुका था, सो हमने फिर से अपनी जी जान वापिस लगा दी उस दूसरे मोज़े को ढूंढने में! करीब 20 मिनट की जद्दोजहद के बाद हमने और हमारे हरामी मन ने हार मान ही ली। उस मोज़े को हमने उठा कर वापिस दरख्त पे रख दिया, और किसी और मोज़े को पेहेन कर बाहर आ गए।
उस मोज़े की गड़गड़ाहट से भरी हँसी ऑफिस में भी मेरे कानों में गूँज रही है , और उसकी टीस अभी भी मेरे मन को व्याकुल कर रही है। पर अब तो आदत सी हो गयी है .... महीने के आधे दिन हम ऑफिस को देर होते हैं, और उसमें से आधे दिन बस उस कमबख्त मोज़े के वजह से देर होते हैं …
खैर, खोज जारी रहेगी … संघर्ष ही जीवन का ध्येय है …

Thursday, 22 October 2015

*वीरेंद्र सहवाग

एक ऐसी कहानी जिससे हर कोई रूबरू है। मैंने "शोले" के धरम जी के बाद "वीरू" नाम सिर्फ सहवाग के लिए ही सुना है। टी20 का चलन तो आज है पर सहवाग!! सहवाग तो पिछले 15 सालों से टी20 का अनुभव दिलाते रहे हैं।
भसड़ का अंदाज़ा इसी से लगा सकते हैं आप के 10 सबसे तेज़ दोहरे शतक में से 5 वीरू के नाम हैं। 2 तिहरे शतक का तो कोई जवाब ही नहीं। वो वनडे में 219 रनों की पारी भुलाये नही भूलती।सहवाग की बाद मैंने ऐसी बम्पर पेलाई करते सिर्फ 'बाहुबली' को ही देखा है!! "आतंकवाद" क्या होता है 'मुल्तान' में आपने महसूस करा ही दिया था पाकिस्तान को! मुझे अभी भी याद है के मैच के दिन मैं इंट्रोल(इंटरवल) में ही भाग आया करता था सरकारी स्कूल में पढ़ने का सबसे बड़ा फायदा यही था के आपकी बैटिंग कभी नहीं छुटती थी!! वो रेलम रेल चौक़े अहा!(सोच के आज लिखते वक़्त मुस्कराहट आजा रही है।) हर आदमी का बुरा दौर आता है और तब देश के चूतिया चूतिया भी नेता बनके आपको समझाने आजाते हैं पर आपकी अलग खासियत थी आपने कभी किसी की नहीं सुनी.. मैंने कभी किसी की न सुन्ना भी आप ही से सीखा है। 
सचिन, द्रविड़ और गांगुली के बिच अपनी एक अलग छवि बनाना आपकी महानता को दर्शाता है। आपका इस तरह सन्यास लेना दुर्भाग्यपूर्ण था और उससे भी बड़ा दुर्भाग्य ये था के जिस वीरू की बैटिंग को हम "आज" इतना मिस कर रहें हैं उसको वापस बुलाने के लिए... उस खिलाड़ी के बुरे दौर में हमसे आवाज तक न निकली?? परसों जब आपके सन्यास की अफ़वाह उड़ी तो लोगो को उनका "सुल्तान" याद आगया.. खैर ये दुनिया बहुत मतलबी है। 
आप हमारे दौर के स्टार हो। और जो जबराट बल्लेबाज़ी हमने देखी है आज के "प्रिंस चार्मिंग" और "कूल डूड पप्पू" कभी नहीं देख पाएंगे। 
मेरे लिए तो क्रिकेट तभी ख़त्म हो गया था जब सचिन ने सन्यास लिया था। आपके जाने के बाद जो टीस है वो उस दौर की जनरेशन ही समझ सकती है।आपकी बल्लेबाजी तो रेडियो पर भी उत्साहित कर दिया करती थी। कई बार धमाकेदार वापसी की है अपने। अफ़सोस ये है के अब न छक्के से शतक लगता देख पाएंगे और न ही लहलहाता हुआ तिहरा शतक...। 
उमर गुल के एक ओवर में 5 चौकों की पेलाई अभी तक याद है मुझे। शायद ही ऐसा कोई गेंदबाज हो जो कभी ये सोचता हो के 'सहवाग' को बॉलिंग करूँ। "सक़लैन मुश्ताक़" का दोहरा शतक आप ही ने पूरा करवाया था। गेंदबाज को नहीं गेंद को देखने वाले सहवाग दिल में बस गए हैं आप। 
आपके उज्जवल भविष्य के लिए हर क्रिकेट प्रेमी हर भारतीय के दिल से शुभकामनायें निकल रही हैं।मुस्कुराते रहिये! चलते रहिये!! कई बल्लेबाज़ आएंगे और सन्यास लेके चले जायेंगे पर वीरू.. हम हमेशा मैच देखते हुए यही कहेंगे.. 
"ओपनर?? ओपनर तो सहवाग था"
(*लिखना तो बहुत कुछ चाहता हूँ आज... पर आज पर्याप्त शब्द ही नहीं है.. अब पता नहीं दोबारा ये क़लम किस योद्धा के लिए उठेगी..!)आप मेरे सुपरमैनमैं आपका सुपरफैन

Friday, 16 October 2015

UFictionaRY





"अरे ओ रिक्शा वाले भइया... पैसे ना लेना इनसे.. जीजा हैं तुम्हारे.."
ये तुमने उस auto वाले से तब कहा था जब तुमसे आखिरी बार रुबरु होकर मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन जा रहा था... मैंने तुम्हें इस बात के लिए डांटा था,पर आज भी गाहे-बगाहे याद करके हंसी आ जाती है.
वैसे आदतन हुई बातचीत मे पूरे रास्ते रिक्शा वाले ने तीन बार तुम्हे 'दीदी' कहा..

तुम्हें कई बार कहना चाहा कि वो Red jeans तुमको सूट नहीं करती है उसपर पर्पल सैंडल..उफ्फ !पर fashion का तकाजा ही ऐसा है,मैं चुपचाप तारीफ करता रहा..
वो green चूडीदार,जिसे पहनकर तुम स्टेशन आयी थी,कमाल लग रही थी.. metro से बाहर आते वक्त मै दूर से तुम्हें पहचान भी नही पाया... आदत डाल लो,हिंदुस्तानी कपड़े तुमपर कहीं ज्यादा फबते हैं..
मुझे पता है,तुम घरपर normally काजल नहीं लगाती पर शायद उस दिन मैं आया था इसलिए और वैसे भी सुना है कि 'अपनो की नजर पहले लगती है..'भूत' लगती हो,ये तो बस तुम्हारा बनावटी गुस्सा देखने के लिए कहा था..वैसे काजल वाली तुम्हारी आंखें,कुछ ज्यादा ही बातें करती है..
वो PVR का evening show याद है..? तुम बेकार में उस टिकट वाले पर गरम हो रही थी,जब उसने corner सीट offer की थी..वो corner वाली सीट मैने ही मांगी थी.. इसलिए कि तुम्हारी दूसरी तरफ कोई आ ना जाए..
और एक आखिरी बात ..वो तुम्हारा dinner पर जाने का plan जो मैंने बहाना बनाकर cancel किया था याद है..? मुझे बुखार नहीं था झूठ कहा था मैनें.. अब 'वो' batting कर रहा था तो मैं कैसे छोड देता यार.. पर तुम cricket से इतना चिढती क्यूं हो.. और जब तुम्हेंं पता है कि जब 'वो' खेल रहा होता है तो मैं तुम्हारा call receive नहीं करूंगा तो फिर बार बार call क्यूं..और फिर खुद ही नाराज़ हो जाती हो..
तुम्हारा अगला call इसके पूरे 8 दिन बाद उस मासूम से सवाल के साथ आया..उस दिन भी match था,पर मैने call receive कर लिया..तब मुझे पता चला कि हर बेमानी सा दिखता सवाल कई बार बेमानी नहीं होता..
बहुत कुछ छिपा होता है उनमें.. मासूमियत,चाहत,sorry... बहुत कुछ... उस एक सवाल ने सारे जवाब दे दिये.. इतनी मासूम कि बिना जाने कि 'वो' आज का match नहीं खेल रहा,तुमने सिर्फ मुझे खुश करने के लिए फोन पर पूछ लिया कि..
"‪#‎sachin‬ ने कितना बनाया.."
*फ्लैशबैक *