मतलब हाथ मुह धो लिए, नाश्ता वाश्ता कर लिए, तैयार वैयार हो लिए, शर्ट वर्ट पैंट वैंट डीओ वीओ सब डाल लिए, बस जूते पहनने की देर थी। निकलने का समय हो गया था। अगर इससे 2 मिनट भी और देर हो जाए तो ऑफिस समय पर न पहुँच पाएं - ऐसी पूरी कैलकुलेशन कर रखी है हमने!
और तभी नीचे गद्दे पे पड़ा हुआ एक 'अकेला' मोज़ा हमें देख कर दांत निपोरने लगा। हृदय में यकायक ही ऐसा आतंक फैलाने वाला डर बैठ गया जिसकी तुलना शब्दों में नहीं की जा सकती।
"दूसरा मोज़ा कहाँ है !!?", मेरे अंतरमन में ये सवाल कौंधा! और साथ ही वो न चाहते हुए भी जानने वाला उत्तर : "पता नहीं कहाँ है ..."
मैंने प्रकाश के वेग से पूरे कमरे की छानबीन शुरू कर दी … एक एक सेकंड में एक घंटा बीतता हुआ नज़र आ रहा था .... समय निकलता जा रहा था … दुसरे मोज़े का कोई पता नहीं ! वो अकेला मोज़ा मेरी तरफ देख कर अट्ठास किये जा रहा था मानो कह रहा हो : "हाहाहा! अब देखता हूँ तू समय पे कैसे पहुँचता है !"
मैं भी उसे ये कह कर टाल देता हूँ, "समय पर तो पहुंचूंगा ही ! अगर तेरा जुड़वा नहीं मिला, तो बाकी पड़े मोज़े पहन कर जाऊंगा ..." वहाँ दरख़्त पे पड़े बाकी मोज़े मुस्कुरा उठे ....
लेकिन हरामी मन ! मानने को तैयार ही नहीं! इधर घड़ी की सूई हमारे अनुमानित समय सीमा को पीछे करने की होड़ में, और इधर हमारा मन जो हारने को राज़ी नहीं। इसी बीच हमारे मन में एक और अविश्वसनीय घटना का डर घर कर के बैठ गया। हमारी गंजी ऐसे ही एक दिन हमारे आँखों के सामने से ओझल हुई थी। और भगवान अल्लाह जीसस कसम खा कर कहते हैं, उस दिन पूरी कायनात छान मारी थी हमने उस गंजी की तलाश में ! आखिर कर थक हार के हमने सारी आस छोड़ दी थी। और हमारे डर, अचम्भे और अविश्वास की आप थाह नहीं ले सकते जब लगभग दो महीने बाद वही गंजी हमें हमारे बिस्तर के पास पड़े गद्दे पे बैठी मिली थी !
इसी कश्मकश, दौड़ और मनः कलोल में हमारी वो कॅल्क्युलेटेड समय सीमा समाप्त हो गयी ! गुस्से और अशांति से तो जैसे हमारा हृदय फूटने को आ गया। अभी भी वो मोज़ा हमारी तरफ नज़र किये रावण वाली हसी हँस रहा था ! बाकी मोज़े भी मायूस हो चुके थे। चूंकि अब वक़्त तो निकल चुका था, सो हमने फिर से अपनी जी जान वापिस लगा दी उस दूसरे मोज़े को ढूंढने में! करीब 20 मिनट की जद्दोजहद के बाद हमने और हमारे हरामी मन ने हार मान ही ली। उस मोज़े को हमने उठा कर वापिस दरख्त पे रख दिया, और किसी और मोज़े को पेहेन कर बाहर आ गए।
उस मोज़े की गड़गड़ाहट से भरी हँसी ऑफिस में भी मेरे कानों में गूँज रही है , और उसकी टीस अभी भी मेरे मन को व्याकुल कर रही है। पर अब तो आदत सी हो गयी है .... महीने के आधे दिन हम ऑफिस को देर होते हैं, और उसमें से आधे दिन बस उस कमबख्त मोज़े के वजह से देर होते हैं …
खैर, खोज जारी रहेगी … संघर्ष ही जीवन का ध्येय है …

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