सवेरे से दोपहर तक, पता नहीं किस किस के छत पे कूदा फांदी मची होती थीI
गर्मी की छुट्टियां नानीघर में बिताते थे हम। जब तक चेहरा न झुलस जाए उसके पहले मजाल है जो हम सब भाई बहन अपनी धमाचौकड़ी से बाज़ आये ? गर्मी क्या होती है ये तो बस ‘नागराज’ के कॉमिक्स में जब नागराज को उसके दुश्मन आग के दरिए में फेंक देते थे, तब ही मालूम चलता था।
बीचली मंज़िल की रसोई से बड़ी भीनी सी खुशबू छत तक आती थी। जैसे ही वो खुशबू हमारे नाक तक पहुँचती थी, हम सारा खेल छोड़कर एक दूसरे को इशारा करते हुए नीचे रसोई तक की दौड़ लगा बैठते थे।
” क्या बन रहा है माँ ? क्या बना रही हो मौसी? नानी, क्या है खाने में ?”, और फिर सवालों की झड़ !
“मछली है! अभी तल रहा है, किसको किसको भूना हुआ खाना है ?”, बस इतना बोलना होता था की हम सब अपने नन्हे हाथों में स्टील के छोटे छोटे प्लेट लेके चूल्हे के सामने बैठ जाते थे।
“दो से ज़्यादा नहीं मिलेगा ! और लोगे तो झोर के साथ कुछ नहीं मिलेगा !” हम सबको पता होता था कि उस प्रसंग का वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं था !
जम कर भात और मछली खायी। जी हाँ ! तब ‘चावल′ नहीं भात खाते थे हम। और फिर वो ‘व्यापारी’ का खेल। तीसरे दिन तक अगर कोई खेल खिंच जाए लेकिन हम उसे खेलने से बाज़ न आएं तो सोचिये कितनी लगन और श्रद्धा रहा करती होगी उस खेल के प्रति ! बच्चे तो बच्चे, मामा और मौसी भी उन झूठे पैसों को गिनने की होड़ में पीछे नहीं रहते थे। तब वक़्त होता था लोगों के पास।
इतने में खबर आई कि बड़े मामा कोई नया वीसीआर कैसेट लेके आये हैं – किसी नए सिनेमा का कैसेट है ! बस फिर क्या। दौड़ कर सब ऊपर वाले मंज़िल के बाहर वाले रूम में पहुँच गए। उस रूम में चारो तरफ शेल्फ पे पुराने और नए सिनेमा के ऑडियो कैसेट और वीसीआर वाले विडियो कैसेट रखे रहते थे। एक मौसी माइकल जैक्सन की शौक़ीन थी – सो कुछ विडियो कैसेट माइकल जैक्सन के गानों और डांस विडियो के भी रखे होते थे।
‘बेस्टाविज़न’ की कलर टीवी रखी होती थी तब उस रूम में। और उसी के नीचे वीसीआर का डब्बा ! सब दौड़ कर अपना अपना फेवरिट स्पॉट पकड़ लेते थे। सबसे ज़्यादा लड़ाई टीवी के बगल वाले स्पॉट के लिए होती थी क्यूंकि वहाँ से सारे बटन दबा सकते थे और रिमोट वाले की एक नहीं चलती थी !
तब सिनेमा कहते थे ‘मूवी’ नहीं। सिनेमा शुरू हुई। 10 मिनट हुए नहीं की कुछ और घर के बड़े पहुँच गए रूम में। अब इनके लिए फिर से शुरू करो कैसेट। फिर से देखे हुए सीन देखो। ऐसा करते करते लगभग 1 घंटा निकल जाता था और तब ही आखिर कर सिनेमा शुरू होती थी।
बच्चों का काम होता था उस रूम में जो कूलर है उसमें पानी भरना। बड़े नाना के रूम से पेडस्टल वाला टेबल फैन उठा के लेते आते थे जो टीवी के पास होता था, और बाथरूम के नल से पाइप जोड़ कर कूलर को पानी से लबालब भर देते थे। मजाल है जो इतने लोगों के होने का बावजूद ज़रा भी गर्मी लगे। लाइट कटने पे 5-6 हाथपंखों का भी जुगाड़ था।
सिनेमा आधी ख़त्म हुई नहीं कि लाइट चली गयी। तब लाइट जाने पर अफ़सोस करना कोई व्यथा नहीं बल्कि रूटीन का एक हिस्सा था। लाइट कब वापिस आएगी इसका ज्ञान तो खैर शहर के बिजली विभाग वालों को भी नहीं होता था।
सो अब क्या किया जाए ? एक मौसी उठ कर रसोई के तरफ चली गयी। शाम होने को आ गयी थी। “ऐ गुड्डू, जाओ तो पिंटू के यहां के यहां से 25 समोसा और आधा किलो जलेबी लेके आ जाओ। सब बच्चा लोग को भूख लग गया है “, नानी ने मामा से कहा। ये बच्चों के नाम पर बड़ों की चांदी हो जाती थी।
“ऐ , लस्सी किसको किसको पीना है ? जल्दी बताओ”, मौसी पूछती। और उनके कहने से पहले ही हम दौड़ के फ्रिज के तरफ भागते और आइस-क्यूब का पूरा ट्रे उठा के रसोई पहुँच जाते। कोई ज्यादा सयाना होता तो रूहाफ्ज़ा की बोतल भी उठा कर ले आता।
शाम ऐसे बीतती। एक हाथ में समोसे और जलेबी और दूसरे हाथ में लस्सी या रूहाफ्ज़ा की ग्लास।
पूरा जमघट ख़त्म होते ही सब बच्चों को आर्डर दिया जाता – इस आर्डर का हमें पूरे दिन इंतज़ार रहता था। “बच्चा लोग, जाओ छत पे पानी मार दो, और बिछावन तकिया लेके ऊपर जाओ” ये सुनने भर की देर थी कि सभी दौड़ पड़े छत की ओर। शाम ढलने को आ चुकी थी – सूरज अपनी लालिमा लिए डूबने को तैयार और दूर शाम की अज़ान। सब छत की टंकी से बेतहाशा पानी की बौछार कर रहे होते थे पूरे छत पर। कोई पाइप से तो कोई बाल्टी से। आधे घंटे में पूरा छत ठंडा हो जाता था।
और फिर बिछावन और तकिया डाल कर सभी भाई बहन,मामा,मौसी,नानी और घर के सब बड़े छत पे आराम करने पहुँच जाते थे। और फिर बातों की झड़ी ! हमारी अपनी टोली होती थी। अन्ताक्षरी वाली। और वो जो अन्ताक्षरी चलती थी वो तब तक नहीं रूकती थी जब तक वापिस लाइट ना आ जाए।
“न से , न से ?” “न न न न ना रे ना रे ना रे” “चुप रहो। ये पहले गा चुके हैं हम लोग। ” और वो झगडे ! ऐसे में किसी ने नीचे झाँका। “ओये , लाइट आ गया है !”
बस फिर क्या ! सारा मजमा बिखेर के सब दौड़ पड़े टीवी रूम की ओर। वो सिनेमा जो पूरी करनी थी।
बस फिर क्या ! सारा मजमा बिखेर के सब दौड़ पड़े टीवी रूम की ओर। वो सिनेमा जो पूरी करनी थी।
आज भी वो सिनेमा ख़तम नहीं हो रही। तब का वक़्त दिल के किसी कोने में उसी अधूरे सिनेमा सा अटका हुआ है। कभी इस तेज़ ज़िन्दगी से फुर्सत मिलती है तो वापिस उन पलों को समेट लेता हूँ। बंद एसी कमरों की गर्मियां तब की गर्मियों से आरामदायक तो हो सकती है, पर शायद उतनी खुशहाल नहीं। वो गाना याद आ रहा है उस सिनेमा से, “प्यार में दिल दे दिया मैंने तुझको दिल जानी … दीवानी मैं ……”

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